देवनागरी में लिखें

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Wednesday, 9 May 2012

*सवाल मेरे* .... !!



                                                       *Rashmi Ravija * *Rashmi Ravija *

*Rashmi Ravija जी* की लिखी लेख्य पढ़ रही हूँ .... , कहानी की नायिका(जया) अपने बच्चों के साथ घर छोड़ने की बात करती है .... उसके पास कारण होता है ,उसके पति(राजीव) न तो उससे प्यार करता  (ज़ुल्म ज्यादा करता) और न उसके बच्चों से .... जितने भी comments आये ,  सभी ने उसकी सराहना की , मैं भी शामिल हूँ.......  
बहुत  सारे सवाल मेरे मन में उमड़-घुमड़ रहे हैं .... ये सवाल मैं **Rashmi Ravija जी* के पोस्ट पर कमेन्ट के रूप में ही करना चाहती थी ,उचित-अनुचित के उलझन  में   पड़ अपने ब्लॉग में ही लिख  रही हूँ ....
                                    मैं , एक औरत को जानती हूँ ,जो इन्हीं हालातों से गुजरी है ,कई बार - कई  बार  घर छोड़ना चाहा .... लेकिन जब भी वो घर  छोड़ना चाहती .... उसे अकेले घर छोड़ना पड़ता .... उसका बच्चा  उससे छीन जाता और वापस रह जाती और फिर से वही जलालत सहती .... बच्चा भी अपनी माँ को ही गलत मानता .... जब तक बच्चा बड़ा हुआ और उसे अपनी माँ सही और सब सच्चाई उसके सामने आई ,तब तक 22-25 साल गुजर गए ,तब हालात बदल गए .... प्रेम तो  नहीं पर समझौता से  जिन्दगी  चल रही है ..... |
                       
                          (1)   औरत घर छोड़ नहीं सकी ,तो क्या वो गलत है .... ??
                          (2)   घर छोड़ सब आसान हो जाता है ..... ??
मैं तो अपनी जिन्दगी में ये अनुभव की हूँ .... जो औरत तलाकशुदा हो या किसी वजह से अकेले रह रही हो तो उसे ज्यादा मुश्किलें उठानी पड़तीं है..... | 

Sunday, 8 April 2012

"अब सब बेमानी हो गया" .....

सूरज बादलो के ओट में छिप जाए ,रात तो न होती .....
रिश्तो में टकराहट हो तो ,रिश्ते नष्ट तो नहीं होते .....
                  
                        http://vranishrivastava.blogspot.in/2011/11/blog-post_1780.html


खैर .... ! कुछ दिनों में दादी-पोते में सुलह हुआ .... जब पोते ने .....                          
                              
                                 http://vranishrivastava.blogspot.in/2012_02_01_archive.html
  
                                                                        और
                    
                       http://vranishrivastava.blogspot.in/2012_03_01_archive.html

16 - 3 - 2012 .....
                            
                           आज दादी की मौत हो गई -----
17 - 3 - 2012 .....
                           
                           पोता उनका अंतिम दर्शन करने आया .....
जब दाह-संस्कार हो गए ..... तब पोता अपने माँ के कंधे पर सर रख , रोते हुए बोला :-  दादी अपने हांथों से मुझे खाना खिलाती थी आज मैं उन्हें  जला दिया ..... ऐसा क्यों होता है.... माँ के पास कोई उत्तर नहीं था ..... और अब सब बेमानी हो गया .....

                        http://vranishrivastava.blogspot.in/2011/11/blog-post_27.हटमल

                        http://vranishrivastava.blogspot.in/2011/11/blog-post_20.html
 अब बस और ..... ?

Friday, 2 March 2012

" हक़ है पगलाने का .... 2"

                               

आज..... फिर….. एक बार.....  अपने बेटे की कामयाबी या यूँ कहे उपलब्धि लेकर आपके सामने हाजिर हूँ.... :) आज.... वो अपने मनपसंद कार्य  को पागया.... वो "ERNST & YOUNG" में ज्वाइन कर लिया.... आज से दो-ढाई साल पहले....एक दिन शाम में वो फ़ोन किया :- माँ मै अपने को ,"इनफ़ोसिस" से निकाल दिए जाने के लिए,इसके ट्रेनिंग एग्जाम में अपने को फेल करने  जारहा हूँ.... मैं.."इनफ़ोसिस" में कार्य नहीं करूंगा.... मै :- अगर कार्य नहीं करना है , तो रिजाइन कर दो ,फेल क्यों होना.... ? बेटा :- रिजाइन करूंगा तो बहुत रुपया देना होगा ....  उतना रुपया मेरे पास नहीं है ,और पापा न इजाजत देगें न रुपया.... मेरी उलझन मैं  समाज - परिवार.... उससे भी बढ़ कर उसके पापा जो पहले से उससे नाराज ,"बेटा "IIT" जो नहीं कर पाया था"..... किसको-किसको समझा पाती मेरा बेटा फेल होकर,"इनफ़ोसिस" से  निकला है.... खैर मैं उसीको समझाई और वो किसी तरह  अपना आज तक कार्य सम्पादित  किया.... जिस बेटे को लेकर………. ,
कभी "एम्स - दिल्ली""लखनऊ""पटना""रांची""दरभंगा""छपरा""मुजफ्फरपुर""सिवान””रक्सौल”” मोतिहारी”....  जो जहाँ बता देता कि चाइल्ड (specialist) डाक्टर हैं…. हर महीने दौड़ती रही....16सालो तक.....  दूसरा  सहारा(मंदिर-मस्जिद,पूजा-पाठ,यज्ञ-हवन,झाड़-फूंक) नहीं ले सकती थी..... एक दिन उम्मीद  टूटती नजर आ रही थी..... मन बहुत बेचैन था..... मन कर रहा था कोई तो सहारा बने.... आज कोई मनौती मान ही लेती हूँ.... लेकिन दिमाग कह  रहा था मनौती फिर उतारोगी कैसे..... ? अगर भगवान् हैं..... सभी की आवाज वे सुनते है.... तो मेरी मन से पुकारी आवाज जरुर सुनेगें और उन्हें सुनना पड़ा….. अपने पति से पूछी आपको भगवान् से दुश्मनी क्यों है..... ? वे बोले :- दुश्मनी नहीं है.... कभी दोस्ती नहीं हूई.... कहते हैं  भगवान् के मर्जी के बिना एक भी पत्ता नहीं हिलता तो उनकी मर्जी ही रही होगी जो मेरे जैसे  भक्त की जो उनकी उपस्थिति को महसूस करती है एक ऐसे इंसान से शादी हो जाना जो  उनसे दोस्ती नहीं कर सका….. ( जिस समय अजहरुदीन का बेटा एक मोटरसाईकिल से दुर्घटना में  मृत्यु हुई…. उससे कुछ दिन पहले मेरे बेटे का भीमोटरसाईकिल से दुर्घटना हूआ था वो भी उस समय  जब दूर-दूर तक कोई नहीं था वह खुद उठा ,मोटरसाईकिल उठाया और 100km  दूर जाकर  अपना  इलाज करवाया…. ये नहीं समझियेगा हल्का रहा होगा….. शरीर पर बने निशाँ कहानी  बता  सकेगें.... 6 टांके के निशाना नहीं गये है "खैर....  … भगवान् ही तो सहायक होते हैं…. :) …..समय कोई भी हो (सुख या दुःख)रुकता नहीं है.....  धैर्य.... धैर्य....धैर्य.... और बस धैर्य....धैर्य....धैर्य.... J आज का दिन देखना मेरे नसीब में भी था और आपसे - आपसबों से अपने बेटे के लिए  आशीर्वाद भी लेनी थी.... J 
                      

                      " आज मेरे लिए दिन होली रात दिवाली है ... " 


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Saturday, 25 February 2012

" हक़ है पगलाने का "

कुछ तो आप सोच रहे होंगे.... ? बेटा ने एक गाड़ी क्या ली , ये तो वावरी हुई जा रही है ,पागल है ,रोज ,हजारों लोग गाड़ी लेते हैं , इसमें इतना इतराने की क्या बात है.... ?
तो बताऊँ.... ?
मेरी ननद की शादी के दुसरे दिन पुरा बाराती "माड़ो"(मंडप,जिसके नीचे शादी की रस्मे होती है) में आये दोपहर का खाना खाने,तो मैं अगले रस्म के लिए अपने कपडे बदलने चली ,अभी  साड़ी हाथ में ली ही थी कि,शोर मचा राहुल(Mehboob - मेरा बेटा 2साल  का) बेहोश हो गया ,भागते-भागते पहुंची तो बेटे को उसकी दादी गोद मे ली थी और वो बेहोशी की हालत मे दादी का पुरा आँचल घोट  रहा था , बाराती मे एक डाक्टर थे वे बोले जल्दी से आपलोग इस  बच्चे को  अस्पताल ले  जाइए मामला  बहुत गंभीर है.... मैं और मेरे पति अपने बेटे के साथ अस्पताल गए ,इलाज हूआ....... , दोपहर से रात....... , रात से सुबह....... ,सुबह से दोपहर....... ,तब  बेटे को होश आया......... , और ये परेशानी मेरा बेटा बचपन से 16 साल के आयु तक भोगा.......... ,  इन चंद शब्दों से आप उन सालो के कष्ट को आंकलन कर पायें तो आज  के  मेरे इस पागलपन को समझ पायें......... हाँ-हाँ-हाँ........ हाँ-हाँ-हाँ........ " हक़ है पगलाने का "

Sunday, 22 January 2012

" झुझंलाहट .... :( "

 "झुझंलाहट "

 sat sun यानी छुट्टी का दिन , सोने पे सुहागा ,पति दोनों दिन घर के बाहर , सोची मस्ती ही मस्ती , नेट हाँथ में ,लैपटॉप , अपने वश में.... :) लेकिन...... रश्मि प्रभा जी का http://bulletinofblog.blogspot.com/2012/01/blog-post_पे गाना नहीं सुनी , http://urvija.parikalpnaa.com/2012/01/blog-post_21.का पन्ना खुला ही नहीं , dheerendra जी का http://urvija.parikalpnaa.com/2012/01/blog-post_21.html का पन्ना कभी आधा खुलता या नहीं खुलता ,मानो  माखौल  उड़ा  रहा  हो , पढ़ने का नशा है....... लो पढ़ लो.....    , यशवंत माथुर की माँ की लिखी कविता http://jomeramankahe.blogspot.com/2012/01/2.htmlपर कुछ लिखना चाहती थी , माँ को नमन करना चाहती थी , पल्लवी जी का http://aapki-pasand.blogspot.com/2012/01/blog-post_वक्त साथ दिया या नहीं पता नहीं  , लेकिन मुझे , sat sun ने sad कर दिया......... ऐसा क्यों होता है , हम जो सोचते है , वैसा क्यों नहीं होता है....... खैर...लेकिन "थोड़ी सी "अच्छी सी बात हुई , यशवंत माथुर जी से msg के द्वारा कुछ सिखने  को मिला , मृगांक बेटू के msg से मन हल्का हुआ.... :) ज्यादा गम , थोड़ी ख़ुशी मिली........... उम्मीद है , शायद  कल (कभी नहीं आता )  सब ठीक हो जाये............ 

Thursday, 12 January 2012

" रिश्ते " या " दिल " , शीशा होते है.... !!

सुनती आई हूँ , " रिश्ते " या " दिल  " ,शीशे ( handal with care , सावधानी हटी ,दुर्घटना घटी ) की तरह होते हैं |
लेकिन  कोई   ऐ   नही  बता  रहा   , किस शीशे की तरह ,
लैम्प-लालटेन के चिमनी की तरह ,  या शीशे के गिलास-बर्तन की तरह ,
या फिर उस दर्पण की शीशे की तरह , जिस में हम अपना चेहरा देखते हैं..... |
जो  भी  शीशे का  सामान  , हम ईस्तमाल  करते  हैं  , वह  एक  न  एक  दिन  टूट  जाता  है  और  हम  उसे  उठा   कर  फ़ेंक  देते   हैं  ,  क्योकि  वह  हमारे किसी  काम  का  नहीं  रह  जाता  | लैम्प-लालटेन के चिमनी  ,  अगर  टुटा   हों  ,  वह  रौशनी  नहीं  होने  देगा  |
शीशे के गिलास-बर्तन , tute hon............ ????
 दर्पण का  शीशा  टूटा  हो  , उसमे  चेहरा  देखना  , अपशगुन  माना  जाता  है.....  |
तो  फिर ऐसे  रिश्ते का  क्या  हो............. ?
एक लड़की शादी करके ,ससुराल आती है | चौथे दिन सास-बहु बाते करती हैं , सास :-- तुम्हारी माँ (  माँ क्या है , सास तो रही नहीं , औरत के नाम पर कलंक है ) की तरह हूँ.... |  तुम मुझसे अपनी सारी बातें कर सकती हो.... |
बहु :-- आपसे मेरी विनती है , मुझसे कभी कोई गलती हो जाए , आपको जो भी , जिस तरह का भी  सजा  देनी  हो  दीजिएगा  ,  लेकिन  मेरे  मैके  वालों से शिकायत नहीं कीजिएगा.... |
दो साल जैसे-तैसे सब ठीक चला.... | दो साल के बाद से , बहु की गलती हो या न हो , सास , बहु के मैके से बाप-भाई को बुलाती , और बहु को ले जाने का आदेश देती.... | बहु के मैके वाले अपनी इज्जत बचाने या बेटी की शादी बचाने के कारण , उसे नहीं ले जाते.... | मैके वालों के नहीं ले जाने पर बहु को अनेको तरह से शारीरिक प्रताड़ना मिलती.... | करीब ये सिलसिला बाईस साल चला... | बहु की ईच्छा ( बहु की कमजोरी थी ) का मान , सास रखती , तो सास-बहु का रिश्ता मधुर होता.... | सास को लगा होगा , इसी तरह बहु को डरा कर रखा जा सकता है.... | लेकिन उलटा हुआ , बहु विद्रोही होती गई.... |
बहु को एक बेटा था.... | बहु कई बार सोची , सब छोड़ कर अलग हो जाए , लेकिन तब उसे अपने बेटे को भी छोड़ना पड़ता.... | बेटे को लगता था की दादी , माँ से ज्यादा प्यार करती है या यूँ कह लें , वो अपनी माँ के पास रहना ही नहीं चाहता था.... | उस हालात में , बहु  समझौता की और सब के साथ ही रही.... | जब बेटा बड़ा हुआ , माँ के सिवा किसी बात नहीं सुनता है , लेकिन बहु को कोई बात  बताने  की  जरुरत  नहीं  पड़ी..... |  आज सारे रिश्ते भी उसके आस-पास है.... | न जाने  उन   बाईस साल सालो में , कितनी बार रिश्ते तार-तार हुए और न जाने कितनी बार दिल टूटा..... |
आज बहु चाहे तो " केवल बेटे " के साथ मस्ती में रह सकती है..... !!!  लेकिन 
 " रिश्ते और दिल " क्यों न कचड़े के डिब्बे में फेके जाते..... ?? शीशा तो एक बार टूटता  है.... |
 " रिश्ते और दिल " कितनी बार टूट सकता है.... ?????

Tuesday, 13 December 2011

" गुस्सा , गुस्सा और गुस्सा "


एक डिब्बा , जिसमें गुड़ था.... !
जो ससुर रोज खाते थे.... !! J
सास  , उस डिब्बे को रोज खाली , करने के लिए बोलतीं.... ! L
लेकिन , “ बहु “ के पास ,दूसरा डिब्बा नहीं होगा , L
या , सोचती होगी , “ ससुर “ ,
जब गुड़ खा लेगें , डिब्बा खाली हो जाएगा.... !! J
“ सास “ , एक दिन ,स्वयं चौकाँ(किचेन) में गईं ,
“ औदौड़ी “ वाले डिब्बा खाली कर ,
डिब्बा में , गुड़ रख दीं.... ! J
इतना गुस्सा आया , न जाने क्यों , 
गुड़ वाले डिब्बा को टुकडा - टुकडा कर दीं.... ?? L
“ बहु “ को गुस्सा आया.... ! L
औदौड़ी , रखने के लिए  ,दुसरा डिब्बा नहीं मिला ,
उसने , औदौड़ी फेकं दी.... !! अपना नुक्सान की....  J
“ ससुर “, को गुस्सा आया , बोलें , 
“ बहु “ को जूता से मार कर ,
घर से बाहर निकाल देगें.... ! L