देवनागरी में लिखें

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Wednesday, 17 April 2013

है कि नहीं ....




है कि नहीं  ……
बहुत गुस्सा में हैं  ……
है कि नहीं  ……
प्रेमी या प्रेमिका बे-वफ़ा निकले ....
पत्नी या पति मगरूर -जल्लाद निकले ....
स्वाभाविक प्रतिक्रिया है ,मेरे  दोस्त  ,
है कि नहीं ….
कोसो ना ,
पानी पी-पी के कोसो ....
जितनी गालियाँ देनी है , दो
उनका नाम लेकर दो ना  …
एक की गलती की सज़ा ,
सारे कौम को क्यूँ दे रहे …
ना-इंसाफ़ी है ….
है कि नहीं ….
औरत के नाम पे कलंक ,
या ...
सारे मर्द एक जैसे कहने से ….
हमारे और रिश्ते भी तो
उसी दायरे में आ जाते हैं .…
है कि नहीं ….
माँ -मौसी ,दीदी-बुआ ,भाभी-चाची ,ताई -मामी ….
ताऊ-फूफा ,मौसा-चाचा ,मामा-पापा ,भाई-भतीजा ....
सभी को भी एक साथ
कोसना-श्रापना चाहेंगे ,नहीं ना  ,
है कि नहीं ….
माँ अच्छी या बुरी निकली तो
लो आप तो यशोदा-कैकई को ले कर बैठ गए ….
दोस्त मेरे
हमारे औलाद विष्णु अवतार नहीं हैं  ,
है कि नहीं .…
बेटा लायक या ना-लायक निकला ,
तो आप श्रवण को याद करने लगे ….
जहां तक मेरी अल्प-बुद्धि कहती है ,
कि वो शादी-शुदा नहीं और अल्पायु थे ….
है कि नहीं .…
बहू तो सभी को तभी भाती
जब वो सास को चौके से छुटकारा दिला कर बिस्तर पर  बैठा दे
डोली से उतरते ही ....
है कि नहीं ....
ननद के नखरे उठा उसे सजा-सवांर दे
डोली से उतरते ही ....
है कि नहीं
देवर के कपड़े धो सहेज दे
डोली से उतरते ही ....
है  कि  नहीं
ससुर को वैसे तो कोई प्रॉब्लेम नहीं होती लेकिन ध्यान तो देना ही चाहिए
डोली से उतरते ही ...।
है कि नहीं ....
छोटे से पौधे को आप गमले में लगाते हैं तो
पूरा ध्यान(care) देते हैं ....
है कि नहीं ....

कड़ी धूप में नहीं रखते
 कहीं जल ना जाए ,
है कि नहीं ....
ज्यादा जल नहीं डालते
 कहीं गल ना जाये  ,
है कि नहीं ....

बहू तो विशाल वृक्ष के रूप में आई है....

अतिरिक्त (Extra) देखभाल(Care) की जरूरत होगी ना
पनपने फूलने के लिए

है कि नहीं ….
बोलो - बोलो है कि नहीं ....

http://sarasach.com/poet/ 

7 comments:

तुषार राज रस्तोगी said...

ऐसे लोग अपना नुक्सान स्वयं करते हैं उन्हें कोसने, गली गलोंच या बेईज्ज़ती से कोई फर्क नहीं पड़ता | मुझे ऐसों पर सिर्फ तरस आता है इससे ज्यादा कुछ नहीं | माफ़ कर देता हूँ ऐसों को और बस यही कहता हूँ के प्रभु इन्हें सद्बुद्धि प्रदान करे क्योंकि ये नहीं जानते ये क्या कर रहे हैं |

बहुत भावपूर्ण और गहन अर्थ वाली आपकी कविता पढ़कर ह्रदय प्रसन्न हो गया माँ | आभार

कभी यहाँ भी पधारें और लेखन भाने पर अनुसरण अथवा टिपण्णी के रूप में स्नेह प्रकट करने की कृपा करें |
Tamasha-E-Zindagi
Tamashaezindagi FB Page

रश्मि प्रभा... said...

गाली के लिए अपशब्दों की ज़रूरत भी नहीं
जिसे मुस्कुराकर देखना भी नहीं चाहिए
उसे मुस्कुराकर देख लो - काफी है :)
और वृक्ष सी बहू
............... छोड़ो - कुछ नहीं कहना
कहकर होगा क्या
उसे तो छाँव देते रहना है - है कि नहीं ??????????

धीरेन्द्र सिंह भदौरिया said...

छोटे से पौधे को आप गमले में लगाते हैं तो
पूरा ध्यान(care) देते हैं ....
बहू तो विशाल वृक्ष के रूप में आई है
है कि नहीं ….
बोलो - बोलो है,,,,,
सच कहती बेहतरीन रचना,आभार,
RECENT POST : क्यूँ चुप हो कुछ बोलो श्वेता. कि नहीं ....

Maheshwari kaneri said...

हाँ बिल्कुल है.. बहुत बढ़िया.. हैं कि नही...?

डॉ. मोनिका शर्मा said...

कितना जीवंत और सटीक रेखांकन .... ये प्रश्न बनते हैं
बहुत बहुत बढ़िया

वाणी गीत said...

शुरू के दिनों में दिया गया प्रेम ,विश्वास जीवन की धरोहर हो जाता है ...बस ये समझ ले पहले यह सबकुछ इकतरफा था , आजकल दोनों और तलवारें खिंची होती है :)

आनन्द विक्रम त्रिपाठी said...

बहू तो विशाल वृक्ष के रूप में आई है....बहुत ही सुंदर चाची जी ।