देवनागरी में लिखें

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Tuesday, 13 December 2011

" गुस्सा , गुस्सा और गुस्सा "


एक डिब्बा , जिसमें गुड़ था.... !
जो ससुर रोज खाते थे.... !! J
सास  , उस डिब्बे को रोज खाली , करने के लिए बोलतीं.... ! L
लेकिन , “ बहु “ के पास ,दूसरा डिब्बा नहीं होगा , L
या , सोचती होगी , “ ससुर “ ,
जब गुड़ खा लेगें , डिब्बा खाली हो जाएगा.... !! J
“ सास “ , एक दिन ,स्वयं चौकाँ(किचेन) में गईं ,
“ औदौड़ी “ वाले डिब्बा खाली कर ,
डिब्बा में , गुड़ रख दीं.... ! J
इतना गुस्सा आया , न जाने क्यों , 
गुड़ वाले डिब्बा को टुकडा - टुकडा कर दीं.... ?? L
“ बहु “ को गुस्सा आया.... ! L
औदौड़ी , रखने के लिए  ,दुसरा डिब्बा नहीं मिला ,
उसने , औदौड़ी फेकं दी.... !! अपना नुक्सान की....  J
“ ससुर “, को गुस्सा आया , बोलें , 
“ बहु “ को जूता से मार कर ,
घर से बाहर निकाल देगें.... ! L

Thursday, 8 December 2011

“ इन्द्रधनुष पर बादल... !!! “

 दहेज़  पर  लिखी  लेख्य  पढ़ी, अपने  विचार  भी  लिखी, 
लेकिन  संतुष्टि  नहीं  हुई, लगा  कुछ  मेरे  पास  भी  है  जो  बताना  चाहिए.... !!
 ( 1 )
“ एक लडकी की शादी उसका भाई तैय करता है.( लड़का  दहेज़ का विरोधी है... लडकी के पापा बहुत खुश हुए ,
उनकी हैसियत  एक इंजिनियर दामाद खरीदने की नहीं थी... L 
दहेज़ लेने की हैसियत तो लड़के-वालों की भी नहीं थी.)

भाई को लेन-देन (दहेज़ ) का लिस्ट दिया गया... 
बाद में मोटर-साईकिल को बदल कर T.V. और  फ्रिज कर दिया जाता है... 
गहने जब बन गए तब उसे तुडवा कर भारी बनवाने का आदेश दिया गया... लिस्ट में अलमीरा भी था .
जिसे  शादी के समय नहीं दिया जा  सका... बाद में दिया जाएगा ऐसा भाई ने वादा किया.
लेकिन  लड़के  ने लड़की  से  मना  करवा  दिया, जो लड़के के  घरवाले  को  पता  नहीं  था... 
अल्मीराह  नहीं मिला  इस का  गुस्सा  लड़के  की  माँ  लड़की के  हर  रिश्तेदारों ( जो लड़की से  मिलने  आते ) के  सामने  जताती... L
शादी के समय रिश्तेदारों  के  बात-चित  से लड़के को दहेज़  के  बारे  में पता  चल  जाता  है... उसे  गलतफमी  हो  जाती  है- मेरे घरवाले  दहेज़  मागें  नहीं, लड़की के  रिश्तेदार  बात  कर  रहें  हैं, जरुर  लड़की के  पापा ने  बात  की होगी...
लड़के  को अपने   ससुर  से  चिढ  हो  जाती है... वो  अपनी  नाराजगी  जब-तब  दिखला  देता... L
लड़की  के पापा ने लड़के  के  पैरों  पर  झुक  कर  माफी  भी मांगी...
लेकिन  लड़के  को  विश्वास  नहीं हुआ...
ससुर  की  जिंदगी  समाप्त  भी  हो  गई , नाराजगी कायम  है  आज  भी... L
                                    क्योकि  लड़के को अपनी  माँ  पर  अँधभक्ति  थी... लड़के के  माता  – पिता  को गर्व  है  की  उनका  बेटा  श्रवण पुत्र  है... ! होना  भी  चाहिए.... !!
उस  युग  में  माँ-बाप  अंधे  थे...
इस युग  में उनका  बेटा  अक्ल  का  अंधा-बहरा  है...
लेकिन  केवल  ससुराल  पक्ष  के  लिए... उसके  विचार  अपने   घर  वाले  के लिए  अलग  और  ससुराल  वालों  के लिए अलग  होते  है... !!  
                
 “ परछाई  –  धुप  –  हवा , पकड़  पाते ,
केश – तारे  , गिनती  कर  पाते ,
आत्मा  का दीदार  कर  पाते... ??"


( 2 )
   “ भुमिहर  का बेटा  और  गुप्ता  की  बेटी  के  love-marriage को  arrange-marriage का  शक्ल  दिया गया!
 तिलक  में  लेन-देन  का showoff, लड़के की माँ, दादी - नानी  को  “ set “ और  पिता, दादा – नाना  को  गले  का  चेन , चांदी  के  बड़े-बड़े  बर्तन , फ्लैट , गाडी , Cash, पटना  से  दिल्ली, राजधानी  से  सभी  बाराती  का टिकेट , दिल्ली  में  fresh होने  के  लिए 5star होटल  में  ठहराना... दिल्ली से  जयपुर , वोल्वो  बस  की  व्यवस्था... वापसी  में  बेटी-दामाद  plane  से और सभी बाराती  ट्रेन  से... 
दोनों  परिवार  काफी  सम्पन्न... !!
 लड़की के माता-पिता और  लड़का-लड़की डॉक्टर,
लड़के के पिता  इंजिनियर  और माँ  भी  educated... !! J
जो  शादी  आदर्श-विवाह  हो  सकती  थी, समाज  के  लिए  मिशाल  बन  सकती  थी, 
एक  नया  दौर  शुरू  हो  सकता  था, वो  क्या  बन  कर  रह  गया... ?

 
" कोई  ऐसा तराजू  – बटखरा  मिल  जाता ,
जिस में  रिश्ते  नापा  – तौला  जाता ,
कोई हैरानी  – परेशानी  नहीं  होती,
रिश्ते  निभाने  में  आसानी जो होती... !! "

“ इन्द्रधनुष पर बादल“  फिर  कभी तो  न  होते... !!! “

Sunday, 27 November 2011

आप सही लिखी थी , कि तुड़ी-मुड़ी मनोस्थिति से बातें निकलती हैं... बात बहुत छोटी सी थी , लेकिन इतनी बड़ी बना दी गई , कि मन व्यथित हो गया ,और वर्षों से दबी बातें जो घर के अन्दर थी , आज सार्वजनिक हो गई.... शायद , "औरत"  हर रूप में सब सह जाये , लेकिन औरत माँ के रूप में अपने गुस्सा को दबा नहीं पाये... ! सच ही किसी ने कहा है :---" दुःख" बांटने से आधा और "सुख" बांटने से दोगुना  हो जाता है.... ! ब्लॉग पर अभिव्यक्ति के बाद मन की व्यथा कुछ तो कम जरुर हो गई.... ! इनका कहना है , कि ये सब मेरे कुंठित मन की अभिव्यक्ति है.... क्या आपलोगों को भी ऐसा लगता है..... ??
                            इतना भी इंतज़ार नहीं हो सका , कि जब घर में लैपटॉप-इनटरनेट आ जाये तो मैं अभिव्यक्ति को पोस्ट करूँ मेरेगुस्सा   में इतनी बैचेनीथी ,किमुझे"साइबरकैफे"तक ले गई....  "साइबरकैफे"में"गेम" जो बच्चों का मनोरन्जन करे , नवयुवकों के लिए "इंटरनेट" , जो उनके ज्ञान में वृद्धि करे , "ब्लॉग" , जो अपने मन की अभिव्यक्ति के लिए आकाश दे.... !
                             पटना में साइबर-कैफे एक चर्चित विषय बन कर रह गया है.... ! समाज के लिए अति उपयोगी ( क्योंकि सभी के लिए कंप्यूटर या लैपटॉप और इंटरनेटकी व्यवस्था करना आसान तोनहीं... ) बनानेके स्थान पर समाजको पतन के राह में डालने का काम क्यों होता होगा.... ?  साइबर-कैफे में शराब की व्यवस्था , बच्चों के प्रेम-स्थल(रगं-रेलियाँ) बनाने की जरुरत तो "पैसे"  की भूख ही कारण होता होगा.... ?   साइबर-कैफे न होकर चकला घर हो.... :(  गलती करते समय , गलती करने वालों की निगाह अपने परिणाम पर कहाँ होता.... !!




Wednesday, 23 November 2011

सास को परिभाषित..... !!

Infer             :---   अनुमान करना ,उनकी सारी ,
Inferible    :---           अनुमानिक ,बाते ही सही ,
Inference    :---     अनुमान करना ,दूसरा ,
Inferior  :---              निकृष्ट ही होगा (low in merit or value) ,
Inferaty:---               निकृष्टता के साथ-साथ ,
Infernality:---        पैशाचिकता बढ़ जाये उनका ,
Infernal:---          नारकीय बना और
Infernaly:---         नारकियता से परिपूर्ण कर दे
Inferiorly:---       हीनता से भर जाये (बहु)
Infest:---   बाधा डाल , और ,
Infestation:---कष्ट ज्यादा दें ,
Infertile:---बंजर कर दें बहु का मन ,
Infertility:---उसरपन से भर दें बहु की जिन्दगी.... !
तभी तो होगी " सास " हिटलर को मात देने वाली.... !!
                                
                                                             या नहीं तो....
 रिश्ते होगीं :---
जैसे :---

कड़ाके की ठंढ में ----
खिली-खिली धुप ----
                                                  
                                               " आन्नदमय "
रिश्ते होगीं :---
जैसे :---

बैचैनी वाली गर्मी में ---
आषाढ़ की पहली बारिश ---
                                                    
                                                     " मधुर "
रिश्ते होगीं :---
जैसे :---

माँ की गोद में ---
नवजात शिशु ----
                                
                                                 " सुरक्षित "

Tuesday, 22 November 2011

शुक्रिया.... ! बहुत -बहुत शुक्रिया.... !!

                                                            शुक्रिया.... ! बहुत -बहुत शुक्रिया.... !!

हम नाम नहीं हम ,
   " किरण " अर्थ है हमारे नाम का.... !
शायद इसीसे एक से शौक हमारे ,
    लिखना अपनी - अपनी पसंद ,
पसंद अपनी लेख्य - लेखनी शायद.... !!

ऊँगली लिखे कुछ शब्द ,
   जब भी Facebook पर ,
आपका भी कुछ लिखना ,
    तभी Facebook पर ,
लगे , आपने थामा , मेरी ऊँगली.... !!        

आपके पास अनुभव है ,वर्षौ का ,
     वर्षों से , लिखतीं आ रहीं हैं आप .... !
आप हैं मेरी मार्ग दर्शिका ,
     मार्गदर्शन करती रहेगीं , हमेशा .... !!

कुछ ,कुछ भी गलत लगे ,
   लगे हाथ सुधार देगीं ,सबकुछ .... !
शुक्रिया कहना है औपचारिकता ,
   औपचारिकता , हमेशा होता जरुरी.... !!
                                                
                                                   शुक्रिया.... ! बहुत -बहुत शुक्रिया.... !!





Monday, 21 November 2011

ऐसा क्यों होता ---- !!

D.G.M. Of PESU S.E. Bihar State Electricity Bord , Senate Member Of Bihar University , Council Member Of IEI From Bihar , Chairman Of Mechanical Engineering Division Board Of IEI , Director Of  Design & Research Of IEI at Bangalore ,
                                               " उपर्युक्त सभी पद एक ही अधीन है... !! "  

उंच्च पद पर आसीन ---
  समाज में प्रतिष्ठित इन्सान ---
प्यार करे या न करे ---
  परवाह बहुत करते ---- !

महंगी साड़ी दिलवानी हो (अपनी मर्जी से) ---
  बाहर घुमाने ले जाना हो (हवाई जहाज से) ---
घर खर्च के लिए देना हो  पैसा  ---
  कंजूसी नहीं दिखलाते ---- !!

बाड़ी - गाड़ी (सोना जरूरी नहीं) ---
     थाली में परोस के देते ---
दुसरे के गलतियों पर ---
  पत्नियों को कसूरवार ठहराते ---- !

होने पर बीमार डॉ.को दिखलाना ---
   जिम्मेदारी समझते(गृह - कार्य नहीं) ---
झगड़े का आधार बात - चीत होता ---
   दुसरे की राय सही नहीं समझते ---- !!

सुख या दुःख एक दुसरे का ही---
     बेनकाब चेहरा होता ---
 थोड़ी देर रुक कर कुछ सोचें ---
   इतनी फुरसत में कहाँ होते ---- !!

                                                        ऐसा क्यों होता ---- !!
तारीफ उनकी , उपर्युक्त बाते ---
लगती उन्हें , कुंठित मन की अभिव्यक्ति ---
जरुरी तो नहीं , कि अकेला होना ही ---
अकेलेपन का एहसास हो --- !
                                            कभी - कभी रिश्तों के साथ लम्बा समय गुजारते हुए भी इन्सान अकेलापन महसूस कर सकता है ---- !! उसके लिए रिश्ते एक समझौता बन जाते हैं --- ! काश .... रिश्ते में समझौता न होकर सामंजस्य होता ---- ???

Sunday, 20 November 2011

एक सवाल....? गलती कितनी बड़ी..... ??


आज मैं और मेरे पति मुजफ्फरपुर आये जहाँ मेरे सास, ससुर, देवर, देवरानी और उनका बेटा रहते हैं..
शाम में मैं और मेरी देवरानी साइबर कैफे गए क्योंकि कई दिनों से मैं कुछ देख-पढ़-लिख नहीं पाई थी....
मैसूर में बहुत समय मिलता था जिसके वजह से एक नशा जैसा हो गया है...
देवरानी को दशहरा-दिवाली के फोटो भी दिखलाना था...करीब एक - डेढ़ घंटे समय बिताने से अच्छा लग रहा था..घर आने पर एक नौकर, जिसे मेरे पति ने २-३ महीने पहले सास के आराम के लिए रखा है, (उसे मेरे आराम के लिए पटना भी रखा जा सकता था,हमें लगा की बंधन हो जायेगा,हमलोग हमेशा बाहर घुमने जाते रहते हैं) बोला:-घडी देखिये,घडी देखिये, घडी देखिय,घडी में समय क्या हो रहा ?ये समय आपलोगों का घुमने का है या चाय नाश्ता का बनाने का ?
नौकर मुंहफट हैं मुझे पता था लेकिन मेरे सामने बोलेगा इसके लिए मैं तैयार नहीं थी, मुझे गुस्सा तो बहुत आया, दूसरा कोई उसे डाटेंगा इसकी भी उम्मीद नही थी (क्योंकि बरसों पहले (८२ से ८८)जब मैं संयुक्त परिवार में अकेली रहती थी (रक्सौल) मेरे पति मुजफ्फरपुर में कार्य करते थे, इतना बड़ा ही नौकर था जो काफी मुंहफट था.. जबाब लगाने के साथ ,जो कार्य मैं करने के लिए कहती वो कार्य नहीं ही करता..
एक दिन घर में कोई नहीं था, बाहर से भिखारिन स्त्री की आवाज आई, नौकर बाहर से आ रहा था,उससे पूछा , बाहर कौन है..? (मुझे बाहर जाने  का अनुमति नहीं थी)वो बोला :-आपकी माँ...!
उस दिन मेरी बर्दाश्त करने की सीमा समाप्त हो गई (शायद इसलिए क्योंकि मेरी माँ नहीं थी, अगर होती तो कम बुरा लगता), मैं उसे डांट नहीं सकती थी.. मेरा मौन विद्रोह शुरू हुआ,उससे कोई कार्य करने के लिए नहीं करती, अपना खाया बर्तन भी धो लेती... ! मेरा विद्रोह किसी से बर्दाश्त नहीं हो पा रहा था.., लेकिन किसी ने नौकर को डाटना जरुरी नहीं समझा, उलटे मेरे पापा - भैया को बुला कर आदेश हुआ मुझे वापस ले जाएँ,  जैसे मैं बाजार से खरीदी कोई चीज हूँ..!!)
 १३-११-२०११
मेरे बेटे को जब मालूम हुआ तो अपने चचेरे बड़े भाई को फोन पर बोला :- नौकर को तुम भी कुछ नहीं बोले, खड़े तमाशा देखते रहे, शांत कैसे रहे..? भाई :-मेरे कुछ बोलने डांटने पर दादी नाराज हो जायेगीं, राहुल :- फोन दादी को दो ,दादी को फोन मिला राहुल :-आप घर की गार्जियन है नौकर को समझाइए वो किसी को जबाब नहीं नहीं दे दादी :-तुम मुझे क्यों बोल रहे हो , मुझे गार्जियन कोई नहीं मानता है जब तुम्हारे पापा थे उन्हें डाटना चाहिए राहुल :-मेरी माँ को कोई कुछ कहता पापा को बुरा कहाँ लगता है..?दादी :-तुम बाहर रहते हो कुछ नहीं जानते हो यहाँ के राजनीती में मत पड़ो..वार्तालाप समाप्त हो गई...थोड़ी देर के बाद दादी फिर फोन कीं :-तुम्हारी औकात की तुम मुझे समझाओ..इस तरह से बात करने की तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई..जब वे बहुत डांटने और चिल्लाने लगी तो राहुल :-दादी आप इतना गुस्सा मत होइए, कुछ गलत तो बोला नहीं हूँ आप दादा पापा या चाचा ,माँ को कुछ बोलते हैं तो मैं कुछ नहीं बोलता हूँ लेकिन नौकर भी बोले तो बर्दाश्त के बाहर की बात हैं न..? दादी :-इतना औकात है तो यहाँ आकर डांट मार के दिखाओ... आज के बाद तुम मुझसे बात नहीं करना...! इतना से उन्हें संतोष नहीं हूआ अपने बेटे (मेरे पति) को फोन करके बोलीं :-तुम्हारा बेटा मुझे आधा घंटा डाटा है.. अब गुस्साने की बारी मेरे पति की थी...लेकिन राहुल की दादी से दो बार की बातों के बिच और बाद में मेरी भी बाते हुई थी सब मिला कर १४ मिनट की बातें थी.. आधा घंटे की बात गलत साबित होते इनकी गुस्सा थोडा शांत हूआ... १४-११-२०११
मैं सोची अशांति फैले ,मैं सास से माफी मांग लूं ,फोन की सास :-हमरा मन में बहुत दुःख लागल बा मैं :-काहे सास :-राहुल हमरा के बहुत बोलले, मैं :-शब्द में बतावल जाये, सास :-तुम नौकर को चढ़ा के मेरी माँ का बेइज्जत कराती हो ? मैं :-सच सच बोलल जाई काहे की राहुल भी सब बात सुन रहल बाड़े ,सास :-हमरा यद् नइखे की का का बोलले लेकिन बहुत कड़ा हो के बोलले ,मैं :-कड़ा होके राहुल बोलले , इ त विश्वास करे वाला बात ही नइखे रउवा गलत गलत बात काहे बोलल जात बानी,राउर बेटा बहुत गुस्सा में बानी ,सास :-बेटा के चढ़ा के मार खिवलु एक दिन तहरो के मारी,
मैं :- एक सवाल....? गलती कितनी बड़ी..... ?? मेरा या मेरे बेटे की गलती इतनी बड़ी थी, की सास-बहु या दादी-पोता में बातचीत बंद हो जाए..?

हंसू या रौऊ.... !!


"मैं :-जानत भी न रहनी की राहुल अपने से बात करहियें हम काहे चाहेब की उ राउर इज्जत न करस.
सास :- तहरा इहे चाल से,तहरा दुआरे कोई थूके नइखे जात.
मैं :-इ दुआर पहले अपने के ह कोई नइखे आवत त हमार  जिन्दगी चल रहल बा की ना..?
सास :_तू भी सास बनबू ,तू भी दादी बनबू..... !!"

मैं हंसू या रौऊ.... !! अतीत की घटना पर केवल रोना ही रोना आया था.... :( राहुल से फिर बात की.
"मैं :-दादी बहुत नाराज हैं,हो सकता है,नाराजगी में संभवत तुम्हारे पापा भी गुस्सा में तुम से कुछ बोलें...?
राहुल :-पापा जितना बोलना चाहें बोलें ... मेरे पास उनके लिए केवल एक सवाल है अगर मेरे जगह वे होते और मेरी माँ के जगह पर उनकी माँ होती तो वे क्या करते... ?"
मैं हंसू या रौऊ.... !!

वातावरण से इन्सान संवेदना + हीन बनता है और जहाँ संवेदना समाप्त हो जाती है वहां हिंसा की प्रवृति बढ़ जाती है... !! "

सभी कहते हैं बड़े बुजुर्ग की साया सर पर रहे तो नई पीढ़ी सुरक्षित रहता है... ! माँ का स्थान भगवान् के पहले आता है.... !! मेरे घर में बेटे समझ रहे हैं और माँ.... ??
मैं हंसू या रौऊ.... !!

जब मैं ब्लॉग बनाई तो लगा क्या लिखूं....? राहुल बोला :- तुम अपने अनुभव से ही शुरुआत करो.... !
लेकिन अनुभव तो अतीत का था जिसमे सुख के पल भी मुझे अपमानित और प्रताड़ित करता हूआ मिला था और दुःख के पल अति दर्दनाक..... !!

मैं निर्णय की थी सिर्फ बर्तमान के अनुभव लिखूंगी... !अतीत को कभी याद नहीं आने दूंगी क्योकि वो केवल डंसता था.... !! हाल के वर्षो में लगने लगा था , सभी बदल गयें है , हालात बदल गया है , फिर एक बार मेरी सोच " मृगतृष्णा की दुनिया " साबित हूआ.... !!!!    लेकिन अपना सोचा कब होता है.... ?
मैं हंसू या रौऊ.... !!

Saturday, 19 November 2011

सफर के ५७ घंटे.... !!


६-११-२०११
सुबह के ५ बजे मैं और मेरा बेटा मैसूर से बंगलौर आये , ९ बजे ट्रेन चली पटना के लिए....!आस - पास कोई येसा नहीं था , जिससे गप्प कर समय काटा जाये....!कोई पत्रिका भी नहीं मिल सका था.... !कुच्छ बोरियत होने लगी थी.... :( चेन्नई से ३ या ४ बजे कुच्छ परिवार चढ़े , जिनसे बात - चीत शुरू हुई.... !!
किसी ने कहा :- " लैला " काफी कुरूप थी , " मजनू " बहुत खुबशुरत...मजनू लैला के प्यार में इतने दीवाने थे ,कि उसकी एक झलक देखने के लिए उसके पीछे - पीछे बेसुध होकर दौड़ा करते.... !!इसी क्रम में उनका पैर , नमाज पढ़ते हुए मौलाना के जानमाज पर पड़ गया.... मौलाना को बहुत गुस्सा आया , वे मजनू को डांटने लगे ,बहुत भला - बुरा कहा....जब मौलाना कुच्छ देर में शांत हुए , तो मजनू ने कहा , मैं तो अपने लैला के प्यार में इतना खोया था तो आपके जानमाज पर नजर नही पड़ी , आप तो उस खुदा के याद में खोये हुए थे , तो आपकी नजर मेरे पैरो पर कैसे पड़ी.... !!
इस पर मुझे एक वाक्या याद आया ...एक दिन मेरी सास द्वारा गुरूवार के कथा सुन रहे मेरे ससुर चिल्ला केर बोले " रमुआ देख त कमरा के कोना में " भाला " बा.... इस पर मेरे पति बोले , विष्णु के खोदे के बा का.... ?"
लिखने का मतलब ये है , कि भगवन कि भक्ति में लीन होने के बाद भी इंसानों का मन भटकता क्यौ है....? यह बहस का मुद्दा था... इस बहस का कोई अंत भी नहीं था.....!!
 ७-११-२०११
आज का मुख्य मुद्दा यह रहा कि बहुओँ के साथ किस तरह से ताल मेल बिठाया जा सके...!यह भी बहस का मुद्दा था और बहस का कोई अंत नहीं था , क्योंकि सभी का अनुभव अलग - अलग था तो विचार एक कैसे एक होता...!!
८-११-२०११
पटना तक पहुँचते -पहुँचते सभी ने मुझ से पूछा कि आप किस निर्णय तक पहुचीं...?मेरा अपना कोई अनुभव तो था नहीं , इस बहस में हिस्सा नहीं बन सकी...मेरा कहना था कि सास -बहु का रिश्ता कोई थियोरी से नही संभाला जा सकता....!ये परिस्थितियों के अनुसार आपसी समझदारी से निबाहा जा सकता है , जो दोनों कि जिम्मेवारी बनती हैं....!! दोपहर के १ बजे ट्रेन पटना स्टेशन पहुंची, २ बजे मैं घर वापस आई... इस तरह ४८ घंटे का सफ़र ५७ घंटे में समाप्त हुई, फिर भी इस बार सफ़र छोटा लगा....!!

विषम प्रस्थिति.... !! ya ??


कोई भी मृत्यु की बाते क्यों करते हैं.... ??
कोई असहनीय पीड़ा , कोई बड़ी असफलता , अकेलापन ,
अवसाद ग्रस्त हो और उसके आस पास का परिवेश भी नकारत्मक हो ,
कोई उसे समझने की कोशिश ही करे या ,
उसे हरदम नीचा दीखाया जाता रहे , या कुछ अन्य.... !!
 कुछ भी ऐसा है जिसका हल हो.... ?
वस्तुतः कारण को जानने और समझने की ज़रूरत ज़्यादा है... !
केवल एक सकारात्मक सोच की जरूरत होती है... !
विषम प्रस्थिति में अपने को उबार लेना ही बहादुरी है .... !!

Friday, 4 November 2011

सांप छछूंदर की गति.... !!

इस यात्रा की मैसूर में अंतिम रात.... !! बेटा बहुत उदास है.... उसका मन है , मैं छ महीने यहीं रहूँ.... उसे कैसे समझाउं ,पत्नी और माँ के बीच चल रहे द्वन्द को.... शादी के इन तीस सालो में , मैं कभी किसी पर्व - त्यौहार पर , अपने मैके या किसी रिश्तेदारों के घर नहीं गई.... पापा - भैया ने न जाने कितनी बार बुलाएँ होगें.... पर मेरा जाना इनको पसंद नहीं आता.... बेटी और पत्नी के द्वन्द में जीत पत्नी की हो जाती.... पापा के जीवन के अंतिम छठ में , उनकी इच्छा थी की मैं भी आऊं परन्तु नहीं जा सकी.... इसका अफसोस , मुझे भी ताउम्र रहेगा.... इस बार पत्नी और माँ के द्वन्द में जीत माँ की हुई.... दशहरे और दीपावली में बेटे के पास रही , उन्हें अकेले छोड़कर.... आते समय , जब वे स्टेशन छोड़ने आये तो बोले , मुझे सजा दे रही हो....?? जाते समय बेटा स्टेशन छोड़ने जायेगा और बोलेगा मुझे अकेले छोड़ कर जा रही हो.... ?? कितना अच्छा होता , बेटा बड़ा ही नहीं होता.... हम तीनो साथ ही रहते.... लेकिन ये कल्पना ही बेबकूफी है.... अभी तो अपने मन को समझाने के लिए , उसे समझाई हूँ , तुम्हे आगे की पढाई की तैयारी करनी है.... मै फिर जल्दी आउंगी , लेकिन जानती हूँ.... जल्दी आ पाना आसान नहीं.... आते समय मन उदास था लेकिन ख़ुशी भी बहुत थी.... !! जाते समय मन बहुत उदास ,सिर्फ उदास और बैचेन है.... :( क्योकि बेटा की इच्छा नहीं है कि मैं जाऊं.... :( शायद , इसी परिस्थिति के लिए बना होगा.... सांप छछूंदर की गति.... !! 

Thursday, 3 November 2011

मैसूर की बरसात.... !!

सूर्य आग का गोला दीखता ,
दूर - दूर बादल नजर नहीं आता ,
पलक झपकते ही ,
लो हो गई बरसात.... !

चमकती धुप थी ,
सूखने के लिए कपड़े ,
डाल कर पलटी ,
लो हो गई बरसात.... !

खिली -खिली धुप थी ,
sun - set देखने का प्रोग्राम बना ,
लो हो गई बरसात.... !

दिवाली के लिए ,
दिया  सजाई ,
लो हो गई बरसात.... !

बारिश - बारिश और सिर्फ बारिश.... !!

इसमें कमी है ,
लिट्टी - चोखे की ,
गर्म - गर्म पकोड़े की,
ख़ुद बना , खाना ,
अच्छा नहीं लगता ,
लो हो गई बरसात.... !

आखें बार बार खिड़की के ,
बाहर झांकती ,
धूप निकलने का ,
इंतज़ार करती ,
लगता है मेरे जाने के बाद ,
ख़त्म होगी मैसूर की बरसात.... ?????
लो हो गई बरसात.... !!

Wednesday, 2 November 2011

" दुःख-सुख "


सुख और दुःख सगी बहनें साथ नहीं आती.... ! 
दुःख और सुख जिन्दगी के हर पहलु को रंगती.... !
सुख और दुःख अति होना जिन्दगी बदरंग करती.... !   
दुःख हल चलाना किसानो को नहीं हराती.... ! 
सुख भोजन का तभी हमें देती धरती.... !
दुःख प्रसव - वेदना का स्त्रियाँ सहती.... !
सुख मातृत्व का पा वे हसंती इठलाती.... ! 
दुःख की जड़े जितनी गहराई से मन में जमती.... !
सुख के लिए उतनी ही जगह दिल में बनती.... !

Monday, 31 October 2011

ख़ुशी के पल

महबूब ( राहुल,मेरा बेटा ) की बहुत ईच्छा थी मै कुछ दिनों के लिए उसके पास आकर रहूँ.... ! ३०-९-२०११ , को रात १२ बजे मै बंगलौर पहुँची ,वहाँ तेज बारिश हो रही थी , हमलोग काफी भींग गये.... ! मैसूर पहुँचते -  पहुँचते मुझे सर्दी - खांसी और बुखार हो गया , जो दस दिनों तक चला , क्योकि मैसूर का तापमान भी असर दिखला रहा था.... !! १३ - ९ - २०११ , गीले फर्श पर तेजी से चलने के कारण पैर फिसला और दाहिने पैर के अगुंठे के बगल वाली अंगुली टूट गई.... ! २१ - ९ - २०११ , सब्जी ( पत्ताकोबी ) काटते समय चाकू (नाइफ) हथेली (बाएँ हाथ) के अन्दर गहराई तक चला गया.... ! दुसरे दिन पैर के चोटिल अगुंली में फिर चोट लग गया... अब बेटे का धैर्य जबाब दे गया.... ! वो वापस चले जाने का अनुरोध करने लगा.... !! मेरे पति को भी चिंता होने लगी.... ! किसी ने कहा " जतरा " ठीक नहीं है.... ! समझ में ये नहीं आया , इसमें " जतरा " कहाँ से आ गया.... ! " जतरा "होता क्या है.... ?? जो होनी हैं , वो तो मै कहीं रहती , दुर्घटना होती.... !! यहाँ आने से जो मैंने पाया ,उसे मैं शब्दों में अभिव्यक्ति करने में अपने को असमर्थ पा रही हूँ..... ! शायद ये फोटो कुछ व्यान कर दे , उसके तुलना में शारीरिक कष्ट कोई मायने नही रखता.... !! Sorry मृगांक.... ! राहुल और मेरी ईच्छा होते हुए भी तुम्हारे साथ " लॉन्ग ड्राइव " का लुफ्त नहीं उठा सके.... :(  थोड़ी सी ये कसक भी है.... :(  लेकिन बहुत जल्द.... :) हमारी ये ईच्छा पूरी होगी.... :):) तब खुशियों के पल दोगुने होगें.... :):):) 
 " I love both of you.... :):) "

Saturday, 29 October 2011

देवी दर्शन या शहर दर्शन


बहुत सालो के बाद मै मंदिर(चामुंडी देवी)गई...! देखा एक बोर्ड लगा था , सीधे प्रवेश 100 Rs. पंक्ति में 20 Rs..हमलोग 20-20 का दो टिकट लेकर लम्बी पंक्ति में लग कर अन्दर  पहुंचे... लेकिन देवी के मूर्ति से बहुत दूर.... ! एक कमरे में देवी की मूर्ति ,उससे आगे के कमरे में  पुजारियों का जमावड़ा , उससे आगे राड के घेरे में पंडितो का पहरा.... !! दर्शन के लिए कुछ सेकंड्स , मूर्ति पर निगाह गई उसके  पहले बाहर.... :( पहले (शादी के) तो  हमलोग भगवन के समीप जाकर जल-फूल-फल-अक्षत चढाते और चरण-वंदना करते.... ! उससे संतुष्टि मिलती थी कि भगवन का हाथ मेरे सर पर है.... :) आज भगवान और भक्तो के बीच इतनी दुरी क्यों.... ??    भगवान की मूर्ति घिस जाने का डर.... मूर्ति तो बनाई जा सकती है.... ! आतंकियों का डर.... पहरा तो उसी के  लिए होना चाहिए.... !
 देवी - दर्शन नहीं शहर - दर्शन का लुफ्त उठाया.... !!
 दर्शन से संतुष्टि नहीं घुमने का मज़ा आया.... ! 
 पहाड़ी - घाटी के दर्शन का आन्नद आया.... !