*Rashmi Ravija * *Rashmi Ravija *
*Rashmi Ravija जी* की लिखी लेख्य पढ़ रही हूँ .... , कहानी की नायिका(जया) अपने बच्चों के साथ घर छोड़ने की बात करती है .... उसके पास कारण होता है ,उसके पति(राजीव) न तो उससे प्यार करता (ज़ुल्म ज्यादा करता) और न उसके बच्चों से .... जितने भी comments आये , सभी ने उसकी सराहना की , मैं भी शामिल हूँ.......
बहुत सारे सवाल मेरे मन में उमड़-घुमड़ रहे हैं .... ये सवाल मैं **Rashmi Ravija जी* के पोस्ट पर कमेन्ट के रूप में ही करना चाहती थी ,उचित-अनुचित के उलझन में पड़ अपने ब्लॉग में ही लिख रही हूँ ....
मैं , एक औरत को जानती हूँ ,जो इन्हीं हालातों से गुजरी है ,कई बार - कई बार घर छोड़ना चाहा .... लेकिन जब भी वो घर छोड़ना चाहती .... उसे अकेले घर छोड़ना पड़ता .... उसका बच्चा उससे छीन जाता और वापस रह जाती और फिर से वही जलालत सहती .... बच्चा भी अपनी माँ को ही गलत मानता .... जब तक बच्चा बड़ा हुआ और उसे अपनी माँ सही और सब सच्चाई उसके सामने आई ,तब तक 22-25 साल गुजर गए ,तब हालात बदल गए .... प्रेम तो नहीं पर समझौता से जिन्दगी चल रही है ..... |
(1) औरत घर छोड़ नहीं सकी ,तो क्या वो गलत है .... ??
(2) घर छोड़ सब आसान हो जाता है ..... ??
मैं तो अपनी जिन्दगी में ये अनुभव की हूँ .... जो औरत तलाकशुदा हो या किसी वजह से अकेले रह रही हो तो उसे ज्यादा मुश्किलें उठानी पड़तीं है..... |
24 comments:
तलाकशुदा औरत को किसी वजह से अकेले रहना पड़े तो उसे ज्यादा मुश्किलें उठानी पड़तीं है..... | घर छोडना गलत होता,...
my recent post....काव्यान्जलि ...: कभी कभी.....
विभा जी,
मैने अपनी कहानी में कमेन्ट में भी लिखा है..."इस जया ने तो हिम्मत कर ली...पर पता नहीं ,हमारे समाज में कितनी जयाएं हैं जो बच्चों के भविष्य के लिए घुट घुट कर अपनी जिंदगी होम कर देती है"
कई महिलाओं के सामने ऐसी स्थितियाँ होती हैं...कि वे चाहकर भी घर नहीं छोड़ पाती...अकेले रहना ..तलाकशुदा जीवन कष्टकर है...पर ऐसे घर में जहाँ उसे प्यार ना मिले...उसकी इज्जत ना हो रहना...पल पल मरने जैसा है...पर हमारी कई बहनें...इतने कष्ट झेलकर भी मुस्कुराने का अभिनय करते हुए जीवन गुजार देती हैं.
बच्चे का गलत समझना गलत नहीं , अबोध मन की स्थिति है .... जो बच्चा नहीं हुआ वैसा , वह ईश्वर का कमाल ...
बच्चे से विमुख कहीं चैन , उसके लिए तो नरक भला .
वैसे नरक दोनों तरफ है - सारी उम्र आंतरिक भय में रहना , घर को घर का रूप देना और अपनी पहचान से संघर्ष ...
पिजरे से निकलना आसान नहीं .
sarthak marmik post.
aapki post bahut dil ko choone waali hai . in sawaalo ka uttar samaaj ko hi dena honga, bacche ka samjhna galat nahi hai. main rashmi didi se sahmat hoon.
aapka aabhaar .
vijay
विभा जी,
मैने अपनी कहानी में कमेन्ट में भी लिखा है..."इस जया ने तो हिम्मत कर ली...पर पता नहीं ,हमारे समाज में कितनी जयाएं हैं जो बच्चों के भविष्य के लिए घुट घुट कर अपनी जिंदगी होम कर देती है"
कई महिलाओं के सामने ऐसी स्थितियाँ होती हैं...कि वे चाहकर भी घर नहीं छोड़ पाती...अकेले रहना ..तलाकशुदा जीवन कष्टकर है...पर ऐसे घर में जहाँ उसे प्यार ना मिले...उसकी इज्जत ना हो रहना...पल पल मरने जैसा है...पर हमारी कई बहनें...इतने कष्ट झेलकर भी मुस्कुराने का अभिनय करते हुए जीवन गुजार देती हैं.
विवशता की आलोचना करके हम अपनी समझदारी तो दिखा जाते हैं , पर जाके पाँव न फटे बेवाई वो क्या जाने पीर पराई .
पल पल मरने से बेहतर तो घर छोडना है क्योंकि जब जलालत और बुरे हालात के साथ मानसिक द्वंद भी झेलना पडे तो वो ज्यादा कष्टकर होता है ऐसे मे औरत को हिम्मत से काम लेकर जया की तरह मजबूती तो लानी ही होगी नही तो नारकीय जीवन जीने के लिये वो मजबूर होगी………और हमारे समाज मे ऐसी ही औरतें ज्यादातर आत्महत्यायें करती हैं जब उन्हे कोई विकल्प नज़र नही आता और बडेहोने पर बच्चे भी उन्हे गलत समझने लगते हैं ऐसा कम ही होता है कि बच्चे सही समझें क्योंकि वो जैसा देख रहे होते है उसे ही सही समझते हैं बाल मन पर छाप ही ऐसी बैठ जाती है…………स्त्री को अपने हालात से तभी तक समझौता करना चाहिये जब तक गुंजाइश हो मगर एक तरफ़ा समझौतों पर दुनिया नही चला करती कम से कम एक माँ अपने बच्चों की ज़िन्दगी से नही खेल सकती और उनके लिये वो किसी भी हद तक जा सकती है जब बच्चो की जान पर बन आती है तो ठोस निर्णय लेना ही पडता है और लेना भी चाहिये………दुनिया कभी किसी की नही होती सब चढते सूरज को ही सलाम करते हैं एक बार ऐसा कदम उठाने पर आलोचना जरूर होती है मगर एक बार हिम्मत और मेहनत से अपने कार्य मे लग जाओ और खुद को सही साबित करके दिखाओ तो यही दुनिया उसके आगे भी झुक जाती है इसलिये समाज की परवाह ना करते हुये जो सही लगे और हित मे हो वो ही कदम उठाना श्रेयस्कर है।
पल पल मरने से बेहतर तो घर छोडना है क्योंकि जब जलालत और बुरे हालात के साथ मानसिक द्वंद भी झेलना पडे तो वो ज्यादा कष्टकर होता है ऐसे मे औरत को हिम्मत से काम लेकर जया की तरह मजबूती तो लानी ही होगी नही तो नारकीय जीवन जीने के लिये वो मजबूर होगी………और हमारे समाज मे ऐसी ही औरतें ज्यादातर आत्महत्यायें करती हैं जब उन्हे कोई विकल्प नज़र नही आता और बडेहोने पर बच्चे भी उन्हे गलत समझने लगते हैं ऐसा कम ही होता है कि बच्चे सही समझें क्योंकि वो जैसा देख रहे होते है उसे ही सही समझते हैं बाल मन पर छाप ही ऐसी बैठ जाती है…………स्त्री को अपने हालात से तभी तक समझौता करना चाहिये जब तक गुंजाइश हो मगर एक तरफ़ा समझौतों पर दुनिया नही चला करती कम से कम एक माँ अपने बच्चों की ज़िन्दगी से नही खेल सकती और उनके लिये वो किसी भी हद तक जा सकती है जब बच्चो की जान पर बन आती है तो ठोस निर्णय लेना ही पडता है और लेना भी चाहिये………दुनिया कभी किसी की नही होती सब चढते सूरज को ही सलाम करते हैं एक बार ऐसा कदम उठाने पर आलोचना जरूर होती है मगर एक बार हिम्मत और मेहनत से अपने कार्य मे लग जाओ और खुद को सही साबित करके दिखाओ तो यही दुनिया उसके आगे भी झुक जाती है इसलिये समाज की परवाह ना करते हुये जो सही लगे और हित मे हो वो ही कदम उठाना श्रेयस्कर है।
सही कहा विभा .. जो औरत तलाकशुदा हो या किसी वजह से अकेले रह रही हो तो उसे ज्यादा मुश्किलें उठानी पड़तीं है..... | समाज उसे चैन से रहने नही देगा.......
घर छोड़ जाना , घर से बाहर की दुनिया में रोज अपनी लडाई करना , जीतना बहुत ही साहस का कार्य है , मगर वे महिलाएं भी कम साहसी नहीं जो घर में रहकर अन्याय के खिलाफ लडती हुई परिस्थितियों को अपने पक्ष में करने में सफल हो पाती है !
बहुत सुन्दर प्रस्तुति...बहुत बहुत बधाई...
इस मामले में सभी की अपनी-अपनी सोच और अपना-अपना नज़रिया है लेकिन वो कहते है न की "जुर्म करने वाले से बड़ा जुर्म सहने वाला होता है" इसलिए कभी-कभी ऐसे हालातों में औरत को दिल के बजाये दिमाग से काम लेना चाहिए। कम से कम मेरा मनाना तो यही है। क्यूंकि यह दुनिया का दस्तूर रहा है और हमेशा रहेगा कि जो जितना झुकता है लोग उसे उतना ही ज्यादा झुकाते हैं एक दिन झुकते-झुकते टूट जाने से बेहतर है सीधे खड़े होकर भी दिखा दिया जाय।
मैं तो अपनी जिन्दगी में ये अनुभव की हूँ .... जो औरत तलाकशुदा हो या किसी वजह से अकेले रह रही हो तो उसे ज्यादा मुश्किलें उठानी पड़तीं है..... | sahi bat hai ak taraf kuvan to dusri taraf khai hoti hai ....soch-samajh kar faisla lena jaruri hai....mujhe lagta hai hausla ko buland kar ghar me hi hathiyar uthana chahiye...jeet avashay hogi...
तलाकशुदा हो या किसी वजह से अकेले दोनों स्थितियों में जीवन गुजारना कष्टदायक होता है,...
MY RECENT POST काव्यान्जलि ...: बेटी,,,,,
bahut marmik prastuti. kuch aise samal jinka jawab dena shyed thoda muskil hai......aurat ko her hal me kabhi apne liye to kabhi apno ke liye samjhauta kerna hi padta hai.....aur jaha tak mai sochta kisi bhi riste ko tod dene se accha hai ki use jaha tak ho sake nibhaya jaye...........koi bhi insaan itna galat nahi ho sakta......halat insaan ko badal dete hai ******
Very nice post.....
Aabhar!
Mere blog pr padhare.
बहुत ही बेहतरीन और प्रशंसनीय प्रस्तुति। मेरे नए पोस्ट "कबीर" पर आपका स्वागत है । धन्यवाद।
भगवान ने भी ना जाने तलाक जैसा अभिशाप औरत को क्यों दिया . चिंतन योग्य प्रस्तुती .
घर छोडना कोई हल नहीं होता औरत हो या पुरुष |समस्या के निदान को प्राथमिकता देनी चाहिये |
आशा
Very nice post.....
Aabhar!
Mere blog pr padhare.
Very nice post.....
Aabhar!
Mere blog pr padhare.
बहुत ही सुंदर प्रस्तुति । मेरे नए पोस्ट पर आपका स्वागत है । धन्यवाद ।
तलाकशुदा का अकेले रह पाना मुश्किल है पर उस मुश्किल का क्या जो बिना तलाक लिए घुट-घुट कर जीने से उत्पन्न होती है.
और फिर तलाक के बाद अकेले रहने की मुश्किल केवल महिलाओं के हिस्से ही आती है, पुरूष तो निर्द्वंद हो जाता है.
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