देवनागरी में लिखें

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Wednesday, 2 November 2011

" दुःख-सुख "


सुख और दुःख सगी बहनें साथ नहीं आती.... ! 
दुःख और सुख जिन्दगी के हर पहलु को रंगती.... !
सुख और दुःख अति होना जिन्दगी बदरंग करती.... !   
दुःख हल चलाना किसानो को नहीं हराती.... ! 
सुख भोजन का तभी हमें देती धरती.... !
दुःख प्रसव - वेदना का स्त्रियाँ सहती.... !
सुख मातृत्व का पा वे हसंती इठलाती.... ! 
दुःख की जड़े जितनी गहराई से मन में जमती.... !
सुख के लिए उतनी ही जगह दिल में बनती.... !

4 comments:

रश्मि प्रभा... said...

दुःख की जड़े जितनी गहराई से मन में जमती.... !
सुख के लिए उतनी ही जगह दिल में बनती.... !sukh paane ke liye dukh se gujarna hota hai

वन्दना said...

सुख दुख जीवन के दो पहिये …………जीना सिखाते हैं

संजय भास्कर said...

गूढ़ अर्थ लिए....अच्छी कविता....बधाई

संजय भास्कर
आदत....मुस्कुराने की
पर आपका स्वागत है
http://sanjaybhaskar.blogspot.com

सदा said...

दुःख की जड़े जितनी गहराई से मन में जमती.... !
सुख के लिए उतनी ही जगह दिल में बनती....
गहन भाव समेटे ...।